51–55 पुश-अप
| अगर आपने टेस्ट में 51–55 पुश-अप किए | |||
| दिन 1 – सेटों के बीच 60 सेकंड (या अधिक) आराम | |||
| सेट 1 | 30 | ||
| सेट 2 | 39 | ||
| सेट 3 | 35 | ||
| सेट 4 | 35 | ||
| सेट 5 | जितने कर सकें (कम-से-कम 42) | ||
| कम-से-कम 1 दिन आराम | |||
| दिन 2 सेटों के बीच 45 सेकंड (या अधिक) आराम | दिन 3 सेटों के बीच 45 सेकंड (या अधिक) आराम | ||
| सेट 1 | 20 | सेट 1 | 22 |
| सेट 2 | 20 | सेट 2 | 22 |
| सेट 3 | 23 | सेट 3 | 30 |
| सेट 4 | 23 | सेट 4 | 30 |
| सेट 5 | 20 | सेट 5 | 25 |
| सेट 6 | 18 | सेट 6 | 25 |
| सेट 7 | 18 | सेट 7 | 18 |
| सेट 8 | जितने कर सकें (कम-से-कम 53) | सेट 8 | जितने कर सकें (कम-से-कम 55) |
| कम-से-कम 1 दिन आराम | कम-से-कम 2 दिन आराम | ||
फ़िल्मकारों को पुश-अप इतना पसंद क्यों है
किसी निर्देशक को डेढ़ मिनट और एक ऐसा किरदार दे दीजिए जिसे बदलना है, तो अक्सर आपको पुश-अप ही दिखेंगे। न कोई संवाद, न कोई व्याख्या, बस कोई फ़र्श पर काँपती बाँहों के साथ, रुकने से इनकार करता हुआ। किसी इंसान के खुद को नए सिरे से गढ़ने के फैसले को दिखाने का यह सिनेमा का सबसे सस्ता और सटीक तरीका है, और इसीलिए यह मामूली-सी हरकत पाँच दशकों के प्रशिक्षण दृश्यों, सैन्य कैंपों और वापसी की कहानियों में बार-बार लौटती रहती है।
इसे रॉकी से बेहतर किसी ने नहीं बेचा। सिल्वेस्टर स्टैलोन ने पूरी फ़्रैंचाइज़ इसी विचार पर खड़ी की कि महानता दरअसल आम मेहनत को उस बिंदु से भी आगे दोहराते रहना है जहाँ ज़्यादातर लोग हार मान लेते हैं, और उन दृश्यों का फ़र्श-वर्क इसी बात का सबूत है। दशकों बाद क्रीड ने वही भाषा नई पीढ़ी को सौंपी, जहाँ एडोनिस विरासत पाने के बजाय अपनी पहचान गढ़ने के लिए अपने ही reps में जूझता है। यह व्यायाम बिना कुछ कहे पूरा भाव संभाल लेता है।
सैन्य फ़िल्में इसे अलग ढंग से, दबाव की तरह इस्तेमाल करती हैं। फुल मेटल जैकेट में स्टैनली कुब्रिक बुनियादी प्रशिक्षण को रंगरूटों को तोड़कर दोबारा गढ़ने की मशीन बना देते हैं, और पुश-अप उसी पिसाई का हिस्सा हैं जो व्यक्ति की अलग पहचान मिटा देती है। एन ऑफिसर एंड अ जेंटलमैन भी उसी ड्रिल-इंस्ट्रक्टर वाली कवायद पर टिकी है, जहाँ हर रेप इस बात की परीक्षा है कि आप टूटेंगे या टिके रहेंगे। यहाँ यह हरकत ज़रा भी जीत नहीं है। यह सज़ा है, सहनशक्ति है, किसी समूह का हिस्सा बनने की कीमत है।
फिर एक रूप वह भी है जो अपने-आप में एक बयान बन जाता है। जी.आई. जेन में डेमी मूर के एक हाथ से किए गए पुश-अप महज़ शारीरिक करतब नहीं, वे एक ही शॉट में सिमटी पूरी फ़िल्म की दलील हैं: एक महिला यह साबित करती है कि वह सबसे कठिन मानक पर, उसी की शर्तों पर खरी उतर सकती है। मुलान एनिमेटेड रूप में वही काम करती है, जहाँ उसका प्रशिक्षण दृश्य उस पल को चिन्हित करता है जब नायिका दिखावा छोड़कर सचमुच सक्षम बनने लगती है। जो हरकत एक फ़िल्म में तकलीफ़ का मतलब रखती है, वही दूसरी में मंज़िल तक पहुँचने का।
यही विविधता पुश-अप को परदे पर टिकाए रखती है। न कोई उपकरण चाहिए, न रिंग, न कोई व्याख्या, क्योंकि देखने वाले ने इसे कभी न कभी आज़माया है और ठीक-ठीक जानता है कि इसकी कीमत कितनी है। इसलिए जब कोई किरदार फ़र्श पर झुककर गिनती शुरू करता है, तो हमें इच्छाशक्ति पर किसी भाषण की ज़रूरत नहीं पड़ती। हम पहले से समझ जाते हैं। और पहचान की उसी झलक में छिपी होती है एक छोटी-सी चुनौती: अगर यह उनके लिए काम कर गया, तो शायद खुद भी फ़र्श पर उतरना बेकार नहीं जाएगा।